भूमिका
हिंदी साहित्य में आधुनिक युग के लेखको मे प्रेमचन्द सर्वाधिक लोकप्रिय लेखक है - न केवल अपने ही प्रात और देश में बल्कि विदेशो में भी । विदेशो में उनको लोकप्रियता कुछ पाठको तक ही सीमित नहीं है, बड़े-बड़े विद्वान् भी उनको कृतियो का अनुसन्धानात्मक रूप में अध्ययन कर रहे है और उस अध्ययन के द्वारा वे भारत की राजनैतिक और सास्कृतिक प्रगति से परिचित होने की सतत चेष्टा कर रहे है । जैसे-जैसे हम अन्य देशो से घनिष्ट सम्पर्क बढाते जायेंगे और अपने साहित्य को अन्य उन्नत देशो के साहित्यो के स्तर पर उठाने का प्रयत्न करते जायेगे, वैसे वैसे अपने महान् साहित्य-सष्टानो की रचनाओं का पुनः पुन मूल्याकन करने को विवश हाते जायेंगे। 'प्रेमचन्द और उनकी साहित्य साधना' अपने एक विश्वविख्यात साहित्य स्रष्टा का ऐसा ही मूल्यांकन है।
प्रेमचन्द पर बहुत सी पुस्तके निकली है पर अधिकाश पुस्तको मे कथाकार अर्थात् उपन्यास और कहानी लेखक प्रेमचंद की ही आलोचना मिलेगी। केवल डाक्टर रामविलाम शर्मा ने अपनी पुस्तक 'प्रेमचन्द और उनका युग' में उनके अन्य साहित्य पर अवश्य प्रकाश डाला है परन्तु प्रेमचन्द के नाटको पर उन्होने भी विचार नहीं किया । यो प्रेमचन्द पर लिखी अब तक की पुस्तको से पूरे प्रेमचद का स्वरूप स्पष्ट नहीं होता। ऐसा प्रतीत होता है कि प्रेमचद के समालोचको ने उनकी शेष रचनाओ को विशेष महत्व नही दिया । नाटको को तो स्पष्ट हो उन्होने गहन उपेक्षा की दृष्टि से देखा है । जिस लेखक ने देश विदेश मे ख्याति प्राप्त को हो उसको पूरी तरह से समझने के लिये यह अनिवार्य हैकि उसकी हर एक रचना की छानबीन की जाय । हमने 'प्रेमचद का अन्य साहित्य' शीर्षक से उनके नाटको और अन्य रचनायो पर विस्तार से विचार किया है । एक दृष्टि से देखे तो इस पुस्तक से पूरे प्रेमचद की कल्पना हो जाती है। हम को पग-पग पर विस्तार-भय से अपने को सयत करना पडा है, इसलिये कृतियो को पालोचना में संकेतात्मक पद्धति से काम लिया गया है । इतना होने पर भी अस्पष्टता कही नही ग्राने पाई, यह इस पुस्तक की दूसरी विशेषता है ।
इस विषय में और कुछ न कह कर हम इतना ही निवेदन करना चाहते है कि प्रेमचद और उनके साहित्य की विशालता को समझने में यह पुस्तक यदि तनिक भी उपयोगी हुई तो हम अपने प्रयत्न को सफल समझेंगे ।
प्रेमचंद पर लिखी गई सभी महत्वपूर्ण पुस्तको और पत्र पत्रिकामो में प्रकाशित लेखो से हमने लाभ उठाया है । यो तो उनका उल्लेख हमने बराबर किया है पर यहाँ एक बार फिर हम उनके लेखको के प्रति कृतज्ञता प्रकाशित करते है । हमें आशा है, जिस उद्देश्य से यह पुस्तक लिखी गई है, उममें इसे अवश्य सफलता मिलेगी। विद्वानो के सहृदयतापूर्ण सुझावो का स्वागत करने को हम सदैव तत्पर रहेंगे ।
हिन्दी विभाग
विनीत
आगरा कॉलिज
पद्मसिंह शर्मा 'कमलेश'
आगरा
O
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